Thursday, 23 January 2014

सांप भी ज़रा देख लो खादी पहन आने लगे

सच भी अब झूठ की डटकर कसम खाने लगे 
सांप भी ज़रा देख लो खादी पहन आने लगे 

भूख के दलदल में बैठे इक तड़पते देश को 
वायदों की रोटियों का ख्वाब दिखलाने लगे 

जो बिक गई थी रात को मजबूरियों के हाट में 
उसके बदन पे राजनितिक रंग चढ़वाने लगे 

मेरा ईश भी देखो ज़रा पार्टियों में बट गया
गीता कुरआन में रख के अब एजेण्डे बिकवाने लगे

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